Isabgol ki kheti-जानिए ईसबगोल की खेती कैसे की जाती है

Isabgol ki kheti- हेलो दोस्तों आपका स्वागत है | हमारी नई पोस्ट ईसबगोल की खेती (Isabgol ki kheti) में आज के इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको इसकी खेती के बारे में बताएंगे | यदि आप भी ईसबगोल की खेती करना चाहते हैं तो इस ब्लॉग को अंत तक अवश्य पढ़े |

ईसबगोल की खेती (Isabgol ki kheti) से संबंधित जानकारी

आज के समय में रोगों के साथ-साथ औषधियों का प्रचलन भी बहुत तेजी से बढ़ रहा है | कुछ किसान हैं जो कि अपनी आय में वृद्धि के लिए पारंपरिक कृषि के अलावा अधिक मुनाफे वाली खेती की और बढ़ रहे हैं तथा जो किसान अपनी पारंपरिक खेती में ही उलझे हुए हैं जिससे उन्हें कम मुनाफा प्राप्त हो रहा है | उन्हें भी अपनी खेती को आगे बढ़ाने के लिए औषधीय खेती की तरफ अग्रसर होना चाहिए |

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ईसबगोल क्या है ?

ईसबगोल एक औषधीय पौधा है | इसका पौधा देखने में झाड़ी के जैसा लगता है | इसमें गेहूं जैसी बालिया लगती है | ईसबगोल की भूसी की मार्केट में बहुत अधिक डिमांड है क्योंकि इसमें बहुत से औषधि गुण पाए जाते हैं | ईसबगोल अपने वजन से कई गुना अधिक पानी अपने अंदर समा लेती है |

ईसबगोल की खेती विश्व में सबसे ज्यादा अमेरिका में की जाती है | इसके अलावा भारत, फिलिपींस, इराक, ईरान, अरब अमीरात में ईसबगोल का उत्पादन काफी बड़े तौर पर किया जाता है | भारत में इसकी खेती राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में काफी अधिक की जाती है | अपना देश भारत ही हर साल लगभग 120 करोड रुपए का ईसबगोल निर्यात करता है | क्षेत्रफल के हिसाब से ईसबगोल की खेती भारत में सबसे अधिक क्षेत्रफल में की जाती है |

ईसबगोल का इस्तेमाल कई बीमारियों के उपचार में किया जाता है, परंतु पेट से संबंधित बीमारियों के लिए ईसबगोल बहुत ही उपयोगी होता है | ईसबगोल का इस्तेमाल औषधीयों के अलावा कई तरह की चीज जैसे- आइसक्रीम, रंग रोगन की चीजों को बनाने में भी बहुत अधिक किया जाता है |

ईसबगोल की उन्नत किस्में

ईसबगोल की बहुत सी प्रजातियां है जो कि अपने जलवायु तथा उत्पादन के आधार पर अलग-अलग की गई है | ईसबगोल की खेती के लिए किसान अपने हिसाब से किस्म का चयन करते हैं जो कि इस प्रकार हैं-

  • गुजरात इसबगोल 2 : इस किस्म के नाम से ही पता चल रहा है कि यह गुजरात के क्षेत्र के लिए अधिक अच्छी है | इस किस्म को पकने में 120 से 125 दिन का समय लगता है इसकी पैदावार 5 से 6 कुंतल प्रति एकड़ होती है जिसमें 28 से 30 प्रसिद्ध तक भूसी पाई जाती है
  • आर. आई. 89 ईसबगोल : ईसबगोल की यह सबसे अच्छी किस्म है | यह किस्म राजस्थान के शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्र के लिए विकसित की गई है | इसकी फसल तैयार होने में 110 से 115 दिन का समय लगता है | इसकी उपज 4.5 से 6.5 कुंतल प्रति एकड़ तक होती है | इस किस्म को कीट तथा रोग कम प्रभावित करते हैं तथा यह उच्च गुणवत्ता वाली किस्म होती है |
  • आर. आई.1 ईसबगोल : आर. आई.1 ईसबगोल राजस्थान में सबसे अधिक उगाई जाती है | इसके पौधे 29 से 47 सेंटीमीटर तक ऊंचे होते हैं तथा यह 112 से 123 दिन में पककर तैयार हो जाती है | इसकी उपज 4.5 से 8.5 कुंतल प्रति एकड़ होती है |
  • जवाहर इसबगोल 4 : इस प्रजाति को सबसे अधिक मध्य प्रदेश में बोया जाता है | इसकी उपज 5 से 6 कुंतल प्रति एकड़ होती है |
  • हरियाणा इसबगोल 5 :‌ इस किस्म के नाम से भी पता चल रहा है कि यह किस्म भी हरियाणा में बहुत अधिक उगाई जाती है | इसका उत्पादन 4 से 5 कुंतल प्रति एकड़ होता है |

ईसबगोल की खेती (Isabgol ki kheti) कैसे करें ?

Isabgol ki kheti

ईसबगोल के लिए उपयुक्त मिट्टी

ईसबगोल की खेती के लिए किसी भी खास मिट्टी की आवश्यकता नहीं होती है | इसकी खेती किसी भी उपजाऊ मिट्टी में की जा सकती है | जिसका PH मान सामान्य हो तथा खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो क्योंकि इसका पौधा अधिक नम भूमि में अधिक विकास नहीं कर पाता है |

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ईसबगोल की खेती के लिए जलवायु

ईसबगोल के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है इसलिए ईसबगोल को रबी की फसल के साथ उगाया जाता है | शुरुआत में इसकी पौधों को बरसात की आवश्यकता होती है तथा पकने के लिए इसे गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है | सामान्य तापमान पर इसबगोल के पौधे में अधिक वृद्धि होती है |

ईसबगोल के खेत की तैयारी

ईसबगोल की अच्छी खेती के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करना बहुत ही जरूरी होता है | खेत तैयार करने के लिए सबसे पहले मिट्टी पलट हल्के द्वारा खेत की गहरी जुताई कर लें | जिससे खेत में मौजूद सभी खरपतवार नष्ट हो जाएंगे | खेत की जुताई के बाद खेत में 10 से 12 गाड़ी सड़ी हुई गोबर की पुरानी खाद या फिर जैविक खाद को डालकर अच्छे से जुताई कर दे |

जब खेत की मिट्टी में गोबर की खाद ठीक तरह से मिल जाए तो खेत को पलेव करने के लिए उसमें पानी छोड़ दें | पलेव के बाद जब मिट्टी अच्छे से सुख जाए तो उसके बाद और रोटावेटर के द्वारा 2 से 3 आड़ी-तिरछी जुताई करके मिट्टी को अच्छे से भुरभुरा बना दे और पाटा लगाकर समतल करते हैं | यदि आप ईसबगोल के बीजों की रोपाई मेड पर करना चाहते हैं तो इसके लिए खेत में उचित दूरी पर मेड को तैयार कर ले |

अगर आप अपनी खेती में रासायनिक खाद का भी प्रयोग करना चाहते हैं तो इसके लिए एनपीके की 50 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की हिसाब से खेत में डालें |

ईसबगोल के बीच की रोपाई

ईसबगोल की बीज के रूप में बुवाई की जाती है | एक हेक्टेयर के खेत में लगभग 4 से 5 किलो बीज की आवश्यकता होती है | बीच की रोपाई करने से पहले बीजों को मेटालेक्जिल की उचित मात्रा में उपचारित कर लिया जाता है |ईसबगोल के बीजों की रोपाई समतल तथा मेड दोनों तरह के खेत में की जाती है | समतल खेत में बीजों की रोपाई छिड़काव विधि द्वारा की जाती है तथा मेड के ऊपर बीजों के रोपाई ड्रिल विधि से की जाती है |

ईसबगोल के बीजों की रोपाई अक्टूबर से नवंबर के महीने में की जाती है |

ईसबगोल के पौधों की सिंचाई

ईसबगोल के पौधों की पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है तथा बीजों के अंकुरण के लिए पहली सिंचाई 5 दिन के अंतराल में की जाती है | जब इसके बीच अंकुरित हो जाते हैं | तब इसकी सिंचाई 20 दिन के अंतराल में की जाती है |

ईसबगोल की फसल में खरपतवार नियंत्रण

ईसबगोल की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्राकृतिक और रासायनिक दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है | खरपतवार नियंत्रित करने के लिए 20 से 25 दिन के अंतराल में निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए |

ईसबगोल की पौधों में लगने वाले रोग एवं रोकथाम

मृदुरोमिल आसिता

यह रोग पौधे में बाली लगने के दौरान लगता है | इस रोग के कारण पौधे का विकास पूरी तरह रुक जाता है | जिससे पैदावार बहुत प्रभावित होती है | इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर सफेद चूर्ण एकत्रित हो जाता है | इस रोग से बचाव के लिए कॉपर ऑक्सिक्लोराइड या मैंकोजेब का छिड़काव ईसबगोल के पौधों पर करना चाहिए |

मोयला

यह एक प्रकार का कीट होता है जो कि पौधों पर आक्रमण करता है | जिससे बहुत हानि होती है | इस कीट का आक्रमण पौधे में फूल आने के समय दिखाई देता है यह कीट पौधों के कोमल भाग से रस को चूस कर उन्हें नष्ट कर देता है | जिससे पौधा कुछ ही समय में खराब हो जाता है | इससे बचाव के लिए इमिडाक्लोप्रिड या ऑक्सीमिथाइल की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर करना चाहिए |

ईसबगोल की खेती में पैदावार

जब पौधा कटाई के लिए तैयार हो जाता है तो इसकी पत्तियां सूख के पीले रंग की दिखाई देने लगते हैं | इस समय उनकी कटाई कर ली जाती है | इसकी कटाई के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि इसकी बालिया इस समय कम टूटती है | पौधों की कटाई के पश्चात उन्हें खेत में ठीक तरह से सुखा लिया जाता है इसके बाद उसे हाथ से मसल कर के दानों को निकाल लिया जाता है |

ईसबगोल की पैदावार की बात की जाए तो इसकी पैदावार किस्मों के ऊपर निर्भर करती है |

ईसबगोल की खेती में लागत तथा मुनाफा

ईसबगोल की खेती बहुत ही कम मुनाफे वाली खेती है | ईसबगोल की खेती में एक एकड़ में लगभग 10 से 11 हजार रुपए की लागत आती है |

मुनाफे की बात की जाए तो ईसबगोल के बीज की कीमत लगभग 12500 कुंतल है तथा ईसबगोल के भूसी की कीमत इससे दो गुना यानि की 25000 रुपये कुंतल है | एक एकड़ में लगभग 1 से 1.5 लाख रुपए का मुनाफा हो जाता है |

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